Tuesday, May 20, 2008

वो पलाश के, कॉमिक्‍स के, तिलस्‍म के....गर्मियों के दिन ।

पता नहीं क्‍यों मुझे गर्मियों का ये मौसम बहुत पुराने दिनों की याद दिला देता है । पिछले कई दिनों से मन बचपन की उस दुनिया में घूम रहा है जहां गर्मियां बड़ी तिलस्‍मी हुआ करती थीं । अपना बचपन यूं तो कोई बहुत क्रांतिकारी नहीं रहा, जिसमें आवारागर्दी की बहुत ज्‍यादा गुंजाईश हो.....लेकिन जैसा बीता है उसकी स्‍मृतियों की ऐसी सरगम आजकल छिड़ रही है कि क्‍या कहें ।

याद आते हैं बचपन वो दिन जो भोपाल में बीते । जब छुट्टियों की विकल प्रतीक्षा की जाती थी । योजनाएं बनाई जाती थीं और जब अचानक किसी धमाके की तरह छुट्टियां सामने आ जाती थीं तो सूझता नहीं था कि क्‍या किया जाए । सारी योजनाएं धरी रह जाती थीं । मई जून की वो ऊबी हुई, सुस्‍त, घुटी घुटी सी दोपहर बहुत याद आती हैं, जब घर में मां  को सोते देखकर हम अकसर 'गली डॉक्टर आबिद' वाले उस घर से चुपचाप सटक लिया करते थे । फिर या तो छत पर जाकर कोनों में कीट-पतंगों की प्रतीक्षा करती गिजगिजाहट से भरी छिपकलियों पर नज़र डाली जाती थी, मुहल्‍ले की करामाती नालियों में नावें छोड़ी जातीं । या फिर छत की ओर जाती सीढियों पर पसरकर कॉमिक्‍स पढ़ी जाती थीं । आसपास के छर्रे-मित्रों से कॉमिक्‍स बदल ली जाती थीं । इस तरह दिन में कॉमिक्‍सों की इतनी खुराक हो जाती कि हज़म नहीं होती । फिर जब रात को नींद आती....जो ज़रा देर से ही आती थी....तो कभी मैन्‍ड्रैक की दुनिया में घूम रहे होते थे तो कभी चंद्रकांता-सं‍तति के इलाक़ों में । लगता था कि हम भी ऐयारी सीख लेंगे और अभी चमत्‍कार करने लगेंगे ।

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गर्मियों की दोपहर की वो मासूम आवारागर्दी बहुत याद आती है, जब मुहल्‍ले के बच्‍चे चोरी से फिल्‍म देखने जाते और हम सोचते कि काश हमें भी कभी चोरी से फिल्‍म जाने मिले तो कितना मज़ा आये । वो कार्टून फिल्‍मों और चैनलों के दिन नहीं थे । इसलिए टी.वी. का जीवन में कोई रोल नहीं था । मौज मस्‍ती के नाम पर बस इतना किया जा सकता था कि भरी दोपहर नींद के खुमार में डूबे किसी अलसाए घर की कॉलबेल टन्‍न से बजा दी जाये और चुपके से भाग जाया जाए । या किसी अंकल का स्‍कूटर न्‍यूट्रल पर करके स्‍टार्ट कर दिया जाये और भाग खड़ा हुआ जाए । बेचारा स्‍कूटर घुरघुराता रहे घंटों तक । पता नहीं क्‍यूं कुछ स्‍कूटर बिना चाभी के चालू हो जाते थे तब ।

तब मुहल्‍ले के कुछ घरों में भूत रहा करता था । एक घर तो अभी भी याद है जहां किसी महिला ने खुद को आग लगा ली थी, उस घर को भुतहा घर माना जाता था । पर दिक्‍कत ये थी कि वहां रहने वाले दोनों बच्‍चों को उनके पिताजी ने मां की कमी पूरी करने के लिए हिंद पॉकेट बुक्‍स की किताबों के बड़े बड़े सेट ला दिये थे । बचपन से ही मिज़ाज ऐसा था कि जो छपा हुआ पुरज़ा दिखे उसे ही पढ़ लिया करते थे । यानी समोसे अख़बार के जिस टुकड़े में लपेटकर लाये जाते अपन तेल से तर उस अख़बार को भी पढ़ लेते थे । पता नहीं पुराने अख़बार पढ़ने में क्‍या आनंद आता था । तो धर्मसंकट था । चुड़ैल वाले घर में जायें कैसे । कहीं कुछ हो गया तो । लेकिन आलमारी में जमी प्रेमचंद की किताबों का पूरा सेट आंखों के आगे तैर जाता था । आखिर प्रेमचंद चुड़ैल से जीत गये । छत पर जाकर दोनों घरों के बीच की दीवार को पार करके हम चुड़ैल वाले उस घर में जाते रहे और दोपहरों को प्रेमचंद की किताबों के पूरे सेट को एक एक करके पढ़ते रहे । सोचिए कि प्रेमचंद को उस भुतहे घर में पढ़ना ऐसा होता था जैसे किसी हॉरर फिल्‍म को देखना हुआ करता है । पता नहीं कब कहां से और किस तरह की प्रेतात्‍मा आ जाये, भूतनी, डाकिनी, चुड़ैल । इस तरह चंपक, चंदामामा और मधु-मुस्‍कान में हमने हॉरर मिलाकर पढ़ा ।

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उन तिलस्‍मी दिनों की एक चीज़ और याद आती है । अकसर शाम को पिता गन्‍ने का रस पिलाने ले जाया करते थे । क्‍या माहौल खिंचा रहता था तब गन्‍ने के रस की दुकानों में । खस की पट्टी की बाड़ बनाकर लकड़ी की कुर्सियां और मेज़ें सजाई जाती थीं । शानदार लाल मेज़पोश । मद्धम संगीत और मेज़ पर रखी नमकदानी । बाहर बोर्ड लगा होता था फलानी मधुशाला । बड़े दिलचस्‍प नाम होते थे । और गन्‍ने के उस रस में बार बार नमक छिड़ककर पीने का आनंद दिव्‍य होता था । उन दिनों में थम्‍स-अप हमें कड़वा लगता और उस आदमी की बेची कुल्‍फी बहुत मीठी.....जिसका एक हाथ नहीं था....लेकिन ठेले के नीचे उसने घंटी लगा रखी थी जिसे बजाकर वो अपनी कुल्‍फी की बांग दिया करता था । वो दूधिया कुल्‍फी...गन्‍ने का वो रस....वो चीज़ें आज मैकडोनाल्‍ड और पेप्‍सी की आंधी में जाने कहां बिला गयीं ।

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उन दिनों पिता शाम को अकसर बग़ीचों में ले जाते । अपनी सबसे अच्‍छी पोशाक पहनी जाती । घंटों जूते के तस्‍में बांधे जाते । जो बार बार खुल जाते । फिर बांधे जाते । और पार्क में डूरेन्‍टा की झाडि़यों से बनी दीवारों और आकृतियों को देखकर अजीब-सा लगता । शहर भर के बच्‍चे पार्क में जमा होते । चकरियां, फिरकियां खरीदी जातीं । बुढिया के बाल खाए जाते । 'जॉय आईसक्रीम' और 'क्‍वालिटी आईसक्रीम' खाई जाती ।  पार्क के उस ओर हम देखते कि लिली टॉकीज़ में 'क़ातिलों के क़ातिल' लगी है । या गूंज बहादुर सिनेमा में 'खूबसूरत' लगी है । तिलस्‍मी फिल्‍मों होती थीं ये हमारे लिए । पार्क के दूसरी तरफ छोटा तालाब का पानी छप छप कर रहा होता था और वहीं नज़र आता बोट क्‍लब का ऑब्‍ज़रवेशन टावर । जिस पर चढ़कर हम लोगों को बोटिंग करते देखा करते थे । कभी नाव की सैर करने का मौक़ा जो मिलता तो डर के मारे हालत पतली हो जाती । लेकिन सारा शहर भोपाल के छोटे और बड़े तालाबों के आसपास बने पार्कों में आया करता था ।

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शायद पलाश, कॉमिक्‍स और तिलस्‍मी गर्मियों के वो दिन आज भी मन की दुनिया में कहीं ठहरे हैं । तभी तो मुंबई की बजबजाई सी गर्मी में मैं उन सुहाने दिनों में घूम रहा हूं ।

Sunday, May 11, 2008

मातृ दिवस पर मुनव्‍वर राणा के चंद शेर ।।

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती

बस एक मां है जो कभी ख़फ़ा नहीं होती ।।

 

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है

मां बहुत गुस्‍से में होती है तो रो देती है ।।

 

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू

मां ने मुद्दतों नहीं धोया दुपट्टा अपना ।।

 

अभी जिंदा है मां मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा

मैं जब घर से निकलता हूं दुआ भी साथ चलती है ।।

 

जब भी कश्‍ती मेरी सैलाब में आ जाती है

मां दुआ करती है, ख्‍वाब में आ जाती है ।।

 

ऐ अंधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया

मां ने आंखें खोल दीं घर में उजाला हो गया ।।

 

मेरी ख्‍वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्‍ता हो जाऊं

मां से इस तरह लिपटूं कि बच्‍चा हो जाऊं ।।

 

मुनव्‍वर मां के आगे यूं कभी खुलकर नहीं रोना

जहां बुनियाद हो इतनी नमी अच्‍छी नहीं होती ।।

 

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा नहीं कर सकता

मैं जब तक घर ना लौटूं मेरी मां सज्‍दे में रहती है ।।

 

बुजुर्गों का मेरे दिल से अभी तक डर नहीं जाता

जब तक जागती रहती है मां, मैं घर नहीं जाता ।।

 

जब से गई है माँ मेरी रोया नहीं,

बोझिल हैं पलकें फिर भी मैं सोया नहीं ।

 

साया उठा है माँ का मेरे सर से जब,

सपनों की दुनिया में कभी खोया नहीं ।

 

ज़रा सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाए

दीए से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है ।।

 

सुख देती हुई मांओं को गिनती नहीं आती

पीपल की घनी छायों को गिनती नहीं आती।

Sunday, April 27, 2008

बाल पत्रिका चंदामामा से जुडी हैं बचपन की यादें: साठ बरस पूरे कर चुकी है चंदामामा

कई दिनों से इस मुद्दे पर लिखना चाह रहा था । मेरी प्रिय पत्रिका 'चंदामामा' ने इस वर्ष साठ साल पूरे कर लिये । पता नहीं देश भर के अख़बारों ने इस समाचार को कितना सुर्खियों में छापा । पर मेरे लिए ये बहुत खुशी की बात है ।

इस एक ख़बर ने मुझे बचपन में बहुत दूर पहुंचा दिया । जब तेनालीराम और विक्रम वेताल की कहानियों में बड़ा रस आता था । चंदामामा ने हमें भाषाई-संस्‍कार दिये हैं । बचपन में कहानियों की भूख को शांत किया है । चंदामामा एक नई दुनिया का झरोखा बन जाती थी । इस पत्रिका का बचपन में कितना-कितना इंतज़ार रहता था । मुझे याद है कि भोपाल में अपने बहुत बचपन के दिनों में 'चंदामामा' ने बहुत साथ निभाया था । जब गर्मियों की छुट्टियां आतीं तो हम अपने मुहल्‍ले की लाइब्रेरी का सहारा लेते । ये कॉमिक्‍स लाइब्रेरी हुआ करती थी । जिसमें फैन्‍टम ( वेताल) के साथ साथ चाचा चौधरी, अमर चित्र कथा, फ्लैश गॉर्डन, राजन इकबाल वग़ैरह की कथाएं तो थीं हीं, टिन टिन, टिंकल वग़ैरह भी होती थीं । यहीं चंदामामा, चंपक और नंदन भी हुआ करती थीं । और हम सभी मित्र अलग-अलग लाईब्रेरी की सदस्‍यता लेते थे । इसका एक फ़ायदा था । सभी एक दो पत्रिकाएं किराए से लाते थे और सभी एक ही दिन में अदला-बदली कर लेते थे । आप कल्‍पना कर सकते हैं कि कितना पढ़ाकू थे, या कॉमिक्‍स और पत्रिकाओं के लती थे हम लोग । रोज़ की आधे से एक दर्जन कॉमिक्‍स और पत्रिकाएं मिलकर पढ़ी जाती थीं । पिछले गुरूवार को जब अमिताभ बच्‍चन ने 'चंदामामा' के साठ वर्ष पूरे होने पर एक विशेष अंक का विमोचन किया तो जैसे सारी पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं । इसलिए सोचा कि आज आपको चंदामामा से जुड़े कुछ तथ्‍य बता दिए जाऐं । इस पोस्‍ट में दी गयी सारी तस्‍वीरें चंदामामा से साभार हैं । ये रही 1948 में छपे चंदामामा के अंक से ली गयी एक तस्‍वीर: 

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विकीपीडिया के मुताबिक़ चंदामामा का पहला अंक जुलाई 1947 में आया था । इस पत्रिका के संपादक हैं बी. नागीरेड्डी और चक्रपाणी । इस पत्रिका को निकालने का मकसद था स्‍वतंत्रता के बाद की पीढ़ी को भारतीय परंपरा, लोकसंस्‍कृति, पौराणिक-संपदा और इतिहास से कथाओं के माध्‍यम से परिचित कराया जा सके । इस पत्रिका के संस्‍थापक नागीरेड्डी  वही बी. नागीरेड्डी हैं जिन्‍होंने 'राम और श्‍याम' और 'जूली' जैसी फिल्‍मों का निर्माण किया । इसी पत्रिका में विक्रम-वेताल श्रृंखला छपी और आगे चलकर इसे एक टी वी धारावाहिक का रूप दिया गया ।

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आरंभ में चंदामामा छह हज़ार प्रतियों के साथ तेलुगु और तमिल में ही छपती थी । तमिल में इसका नाम था 'अंबुलीमामा' । बाद में कन्‍नड़ में भी आई और सन 1949 से इसका हिंदी संस्‍करण आरंभ हुआ । 1978 से चंदामामा चौदह भारतीय भाषाओं में छपने लगी । 1984 में इसका संस्‍कृत संस्‍करण आरंभ हुआ । चंदामामा सन 1947 से 1998 तक लगातार छपती रही । लेकिन 1998 में मज़दूरों से हुए एक विवाद की वजह से इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया । एक साल बाद चंदामामा ने वापसी की और तब से ये लगातार छप रही है । 2004 में इसका संथाली संस्‍करण भी शुरू हुआ । और ये ऐसी पहली बाल पत्रिका बन गयी जो एक जनजातीय भाषा में छापी जाती है । हिंदी अंग्रेजी और तेलुगु में इसके ब्रेल संस्‍करण भी निकलते हैं । आज सारे संस्‍करणों को मिला दिया जाये तो हर महीने चंदामामा की दो लाख्‍ा प्रतियां बिक रही हैं । सबसे बड़ी बात ये है कि ये स्‍वत: स्‍फूर्त बिक्री है । चंदामामा एक भी पैसा अपने विज्ञापन में खर्च नहीं करता । हालांकि इसके संपादक प्रकाशक मानते हैं कि जितनी प्रतियां आज इसकी बिकती हैं उससे करीब चार गुना ज्‍यादा बिकने लायक़ बाजा़र भारत में है । चंदामामा की सफलता इस बात का संकेत है कि स्‍तरीय सामग्री के पाठक हर युग में उपलब्‍ध होते हैं । आज जबकि बड़े बड़े प्रकाशक पत्रिकाओं के ना चलने की दुहाई देते हैं, चंदामामा शान से चल रही है और बिना समझौते के चल रही है ।

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बच्‍चों के लिए जिस तरह का 'कन्‍टेन्‍ट' आजकल विदेशी कार्टून नेटवर्कों या विदेशी कन्‍टेन्‍ट के सहारे चल रहे देसी नेटवर्कों के ज़रिए परोसी जा रही है उससे बच्‍चों का क्‍या हाल हो रहा है, आप अपने घर और पास पड़ोस में देख सकते हैं । चंदामामा ने पौराणिक और भारतीय कथाओं को आधार बनाया । शानदार चित्र दिये और स्‍तरीय सामग्री के सहारे अपनी सफलता को सुनिश्‍चित किया । इससे ये भी साबित होता है कि आजकल के बच्‍चे 'डिज़नी नुमा' सामग्री भले देखें लेकिन भारतीय कन्‍टेन्‍ट को नकारते नहीं हैं । जिस तरह की प्रांजल और शुद्ध हिंदी में चंदामामा अपनी कथाएं देता है उससे बच्‍चों का शब्‍द भंडार बढ़ता है । मुझे विश्‍वास है कि अन्‍य भारतीय भाषाओं में भी चंदामामा भाषाई और सामग्री की शुद्धता या स्‍तरीयता पर ज़ोर देती होगी ।

चंदामामा के साठ वर्ष पूरे होने पर अमिताभ बच्‍चन ने चंदामामा के विशेष संस्‍करण का विमोचन किया । इस दौरान उन्‍होंने क्‍या कहा, आप यहां पढ़ सकते हैं । अमिताभ का कहना था कि वे चंदामामा के बचपन से ही फैन रहे हैं । चित्र साभार जागरण याहू समाचार

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दिलचस्‍प बात ये है कि चंदामामा ने टेक्‍नॉलॉजी के हिसाब से बदलाव भी किये हैं । कुछ बड़ी कंपनियों के साथ इसका समझौता भी हुआ है । चंदामामा की वेबसाईट भी आई है और विभिन्‍न भाषाओं में इसके पुराने अंक भी डिजिटाईज़ करके उपलब्‍ध करवा दिये गये हैं । हालांकि आज जब मैंने चंदामामा पर पुराने अंक खोजने चाहे तो वो लिंक काम नहीं कर रहा था । चंदामामा की इस वेबसाईट पर मशहूर चरित्रों के आधार पर भी कहानियों को खोजा जा सकता है । जैसे अकबर बीरबल, विक्रम वेताल, गणेश, कृष्‍ण, दुष्‍टु दत्‍तु, भीम वग़ैरह ।

चंदामामा का साठ वर्ष पूरा करना हम सबके लिए प्रसन्‍नता की बात है  । हमारी प्रिय पत्रिका चंदामामा आज भी उपलब्‍ध है । मैंने इसे पढ़ने का फैसला किया है और ये भी फैसला किया है कि अब उपहार में बच्‍चों को हर कहीं यही पत्रिका भेंट की जाएगी । बल्कि कल जब अपने एक सहकर्मी से जिक्र किया तो वो बोले कि मैं आज ही जाकर चंदामामा के सारे उपलब्‍ध अंक अपने बेटे को दिलवाऊंगा । आपका क्‍या कहना है । आपकी कौन सी यादें चंदामामा से जुड़ी हैं ।

चंदामामा के संपादक बालशौरी रेड्डी से बातचीत यहां सृजनगाथा में पढि़ए ।

अब आप मुझे यहीं से ई-मेल भी कर सकते हैं ।

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